शिक्षा में लैंगिक समानता का अर्थ लड़कों और लड़कियों को समान अवसर, संसाधन और सुरक्षित वातावरण प्रदान करना है - डॉ अनुसुइया
फैकेल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम में डॉ अनुसुइया प्रमुख वक्ता
उक्त उद्गार वीरांगना रमोतीन माड़िया शासकीय आदर्श महिला महाविद्यालय नारायणपुर द्वारा हाइब्रिड मोड पर आयोजित संकाय विकास कार्यशाला में प्रो डॉ अनुसुइया अग्रवाल डी लिट् प्राचार्य स्वामी आत्मानंद शासकीय अंग्रेजी माध्यम आदर्श महाविद्यालय महासमुंद मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त कर रही थी। यह आयोजन महाविद्यालय के प्राचार्य श्री बी डी चांडक एवं डॉ. अनिल भतपहरी के मार्गदर्शन में आयोजित एवं रुसा 2.0 द्वारा प्रायोजित किया गया था।
डॉ अनुसुइया ने अपनी बात स्थापित करते हुए ओजपूर्ण शब्दों में कहा कि शिक्षा में लैंगिक समानता का अर्थ केवल लड़कों और लड़कियों को स्कूल या कॉलेज भेजना मात्र नहीं है बल्कि उन्हें समान अवसर, संसाधन और सुरक्षित वातावरण प्रदान करना है ताकि वे अपनी क्षमता का पूर्ण विकास कर सकें। सरकार का विद्यालय एवं महाविद्यालय खोलने का उद्देश्य महिलाओं को उच्च शिक्षा से जोड़ना है। इससे भारत में शिक्षा के स्तर में बहुत सुधार हुआ है।
विभिन्न शासकीय योजनाओं जैसे 'सर्व शिक्षा अभियान', 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ', महिलाओं को शिक्षा हेतु अनुदान, छात्रवृत्ति व छात्रावास निर्माण आदि के कारण बालिकाओं के प्रति सामाजिक सोच बदलने और उनकी शिक्षा सुनिश्चित करने में सहायता मिली है। फलस्वरुप महिला शिक्षा की दर में काफी वृद्धि हुई है तथा लैंगिक समानता की दिशा में सकारात्मक बदलाव परिलक्षित हुआ है।
उन्होंने आगे कहा कि नारी व पुरुष की शारीरिक संरचना भिन्न है। जिसमें पुरुष कठोर व महिला कोमल व ममतामयी होती है इसीलिए जयशंकर प्रसाद ने लिखा है कि'
''नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नभ पग तल में...
पीयूष स्रोत सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में"
नारी को 'नारायणी' कहा एवं माना जाता है। नारी ने अपने इस नारायणी रूप को सुरक्षित रखते हुए प्रगति के अनेक सोपानों को तय किया है।
लैंगिक समानता को स्थापित और प्रभावी करने की शुरुआत सर्वप्रथम भारत की प्रथम IAS अन्ना राजम मल्होत्रा ने 1951 में किया था। बाद में प्रथम IPS किरण बेदी हुई। भारत की प्रथम प्रधानमंत्री आयरन लेडी श्रीमती इंदिरा गांधी और वर्तमान राष्ट्रपति माननीय द्रौपदी मुर्मू का भी उदाहरण डॉ अग्रवाल के द्वारा दिया गया। ये दृष्टांत स्वरूप भारतीय समाज में स्वीकार किए गए। महिलाओं की शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा सेवा, ट्रांसपोर्ट, एवं प्रौद्योगिकी आदि सभी क्षेत्रों में भागीदारी बढ़ी है। मुख्य वक्ता ने कहा कि ऐसे आयोजनों से महाविद्यालयीन छात्राओं में स्वावलम्बन, आत्मविश्वास, महिला सशक्तिकरण के साथ देश सेवा भावना का निर्माण होता है।
यह फैकेल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम का तृतीय दिवस था। कार्यक्रम की शुरुआत दीपिका कोर्राम (अतिथि व्याख्याता - रसायन शास्त्र) के द्वारा की गई। महाविद्यालय के संदर्भ में दीपिका कोर्राम और महाविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. अनिल कुमार भतपहरी (हिन्दी साहित्य) के द्वारा संक्षिप्त परिचय दिया गया। कार्यक्रम की मुख्य और एकमात्र वक्ता डॉ. अनुसुइया अग्रवाल (D.Litt) थीं, जिन्होंने "उच्च शिक्षा में लैंगिक समानता नीतियां, चुनौतियां और अवसर" विषय पर अपना व्याख्यान दिया।
प्रश्न-उत्तर सत्र में दुलेश्वरी कंडरा, डॉ. अनिल भतपहरी सर एवं मीना पोटाई ने प्रश्न पूछे, जिनका उत्तर डॉ अनुसुइया के द्वारा बहुत सुंदर तरीके से दिया गया। प्रश्नोत्तर काल के अन्योन्य नवीनतम ज्ञानवर्द्धक बातों से सभी लाभान्वित हुये । कार्यक्रम में महाविद्यालय के प्राध्यापक, कर्मचारी एवं सभी छात्राएं उपस्थित रहीं। धन्यवाद ज्ञापन श्रीमती दुलेश्वरी कंडरा के द्वारा किया गया।
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