श्रीमद्भगवद्गीता के संदेश और कर्मनिष्ठा के साथ राज्य का संचालन करने वाले मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव
(अंजनी सक्सेना-विभूति फीचर्स)
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ भगवद गीता (अध्याय 2, श्लोक 47)
कर्म को ही अधिकार मानने और फल की आसक्ति से दूर रहने का यह संदेश भारतीय जीवन-दर्शन का सार है। जब कोई जनप्रतिनिधि इस भावना को अपने व्यवहार में उतारता है, तब उसका सार्वजनिक जीवन केवल प्रशासनिक कार्यों तक सीमित नहीं रहता, वह मूल्य आधारित नेतृत्व का उदाहरण बन जाता है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का व्यक्तित्व और जीवन-यात्रा इसी कर्मयोगी दृष्टि से जुड़ी दिखाई देती है। उनके जन्मदिन के अवसर पर उनके कार्यों के साथ-साथ उनके जीवन-दर्शन और पारिवारिक पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक हो जाता है।
डॉ. मोहन यादव की शिक्षा-दीक्षा जिस भूमि पर हुई, वह भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा की प्रतिष्ठित धरोहर के रुप में सुविख्यात धार्मिक नगरी उज्जैन है। यह वही पावन भूमि है जहाँ गुरु सांदीपनि के आश्रम में भगवान कृष्ण ने शिक्षा प्राप्त की थी। उज्जैन केवल एक ऐतिहासिक नगर नहीं, वह धर्म, दर्शन, ज्योतिष और सांस्कृतिक चेतना का केंद्र रहा है। जिस धरती पर श्रीकृष्ण ने नीति और जीवन का ज्ञान अर्जित किया, उसी धरती पर मोहन यादव ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पाई। इस सांस्कृतिक वातावरण ने उनके व्यक्तित्व को गहराई दी। उनके भीतर कर्तव्य, अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना का विकास केवल राजनीतिक प्रशिक्षण से नहीं, उस सांस्कृतिक परिवेश से भी हुआ जिसने सदियों से इस क्षेत्र को विशिष्ट बनाया है।
उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि साधारण रही है। एक सामान्य परिवार में जन्मे और पले-बढ़े मोहन यादव ने जीवन की प्रारंभिक अवस्थाओं में ही श्रम और संयम का महत्व समझा। माता-पिता ने उन्हें ईमानदारी, सादगी और समाज के प्रति संवेदनशीलता के संस्कार दिए। यही संस्कार आगे चलकर उनके सार्वजनिक जीवन की आधारशिला बने। आज जब वे राज्य की सर्वोच्च जिम्मेदारी निभा रहे हैं, तब भी उनके व्यवहार में वही सादगी दिखाई देती है, जो उनके प्रारंभिक जीवन का हिस्सा रही।
छात्र जीवन में उनका जुड़ाव अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से हुआ। परिषद ने उन्हें संगठनात्मक जीवन का अनुभव दिया। छात्र राजनीति के माध्यम से उन्होंने नेतृत्व, संवाद और सामूहिक कार्यशैली को निकट से समझा। परिषद के अनुशासन से राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना उनके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बन गयी। इसके साथ ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी जुड़े रहे। संघ के संस्कारों ने उन्हें सादगी, अनुशासन, समयबद्धता और समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचने की प्रेरणा दी। परिवार से मिले मूल्य और संगठन से प्राप्त प्रशिक्षण ने उनके व्यक्तित्व को संतुलित और स्थिर बनाया।
मुख्यमंत्री बनने के बाद उनका आचरण यह स्पष्ट करता है कि वे पद को व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, दायित्व के रूप में देखते हैं। मुख्यमंत्री निवास को लेकर उनका दृष्टिकोण इस सोच का उदाहरण है। वे वहाँ अकेले रहते हैं। परिवार को स्थायी रूप से वहाँ नहीं रखते। कई अवसरों पर जब उनसे इस विषय में पूछा गया, तो उन्होंने सहजता से कहा कि यह निवास मुख्यमंत्री के पद को मिला है, व्यक्ति या उसके परिवार को नहीं। यह विचार केवल विनम्रता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादा की गहरी समझ का प्रतीक है। वे मानते हैं कि पद अस्थायी है, व्यक्ति नहीं। इसलिए पद की गरिमा को बनाए रखना आवश्यक है। उन्हें मिली सुविधाओं का वे और उनके परिजन सीमित उपयोग करने का प्रयास करते हैं। यह सोच सार्वजनिक जीवन में शुचिता और पारदर्शिता की भावना को मजबूत करती है।
उनकी सहजता और सुलभता ने उन्हें कम समय में जनमानस के निकट ला दिया। प्रशासनिक कार्यक्रमों और औपचारिक बैठकों के बीच भी वे आम नागरिक से संवाद का अवसर नहीं छोड़ते। कई बार किसी दौरे पर जाते समय वे रास्ते में काफिला रुकवा देते हैं। सड़क किनारे भुट्टा बेचने वाले से बातचीत कर लेते हैं, उसका हालचाल पूछते हैं, भुट्टा खरीदकर वहीं खा लेते हैं। कभी किसी छोटी चाय की दुकान पर रुककर चाय पी लेते हैं और दुकानदार से सामान्य बातचीत कर लेते हैं। यह व्यवहार किसी औपचारिकता का परिणाम नहीं, उनके स्वभाव का हिस्सा है। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी यह सरल अंदाज कायम है। यह शैली उन्हें जनता के बीच सहज और विश्वसनीय बनाती है।
डॉ. मोहन यादव अपने कर्म और निर्णयों से संदेश देने में विश्वास रखते हैं। उन्होंने केवल मंच से सादगी और संयम की बात नहीं की, अपने निजी जीवन में भी उसे अपनाया। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने अपने दोनों बेटों का विवाह संपन्न कराया। दोनों ही विवाह गरिमामय और सम्मानजनक ढंग से हुए। उनमें अनावश्यक दिखावा या भव्यता का प्रदर्शन नहीं था। छोटे बेटे का विवाह, विवाह सम्मेलन के माध्यम से हुआ। यह निर्णय समाज के लिए एक स्पष्ट संदेश था कि वैवाहिक संस्कार की पवित्रता खर्च और तामझाम से नहीं बढ़ती। सादगीपूर्ण और संयमित विवाह भी उतना ही सम्मानजनक होता है।
आज के समय में विवाह समारोह अक्सर प्रतिस्पर्धी प्रदर्शन का माध्यम बन जाते हैं। कई परिवार सामाजिक दबाव के कारण अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च कर बैठते हैं। ऐसे वातावरण में यदि राज्य का मुख्यमंत्री अपने परिवार में सादगीपूर्ण विवाह का उदाहरण प्रस्तुत करे, तो वह समाज में सकारात्मक सोच को प्रोत्साहित करता है। यह संदेश देता है कि सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार दिखावा नहीं, मूल्य और संस्कार होने चाहिए। उनके इस निर्णय में परिवार की भी सहमति और सहभागिता रही। यह सामूहिक प्रयास था, जिससे समाज को संयम और संतुलन का संदेश मिला।
उनका जीवन यह भी दर्शाता है कि नेतृत्व केवल नीतियों के निर्माण से नहीं, व्यक्तिगत आचरण से स्थापित होता है। यदि नेता स्वयं सादगी अपनाए, तो वह प्रशासनिक तंत्र और समाज दोनों के लिए उदाहरण बनता है। यदि वह पद की मर्यादा को निजी जीवन में भी महत्व दे, तो शासन की विश्वसनीयता बढ़ती है। मुख्यमंत्री निवास में अकेले रहने का निर्णय, सरकारी सुविधाओं का सीमित उपयोग, आम नागरिक से सहज संवाद और पारिवारिक आयोजनों में सादगी ये सभी पहलू मिलकर उनके व्यक्तित्व की एक स्पष्ट छवि प्रस्तुत करते हैं।
उज्जैन की सांस्कृतिक भूमि, जहाँ श्रीकृष्ण ने शिक्षा प्राप्त की, वहाँ पले-बढ़े एक व्यक्ति का जीवन यदि कर्मयोग, सादगी और सामाजिक संदेश का माध्यम बने, तो यह परंपरा की निरंतरता का संकेत है। उज्जैन की आध्यात्मिक विरासत और संगठनात्मक जीवन के अनुशासन ने उनके भीतर संतुलन और स्थिरता का भाव विकसित किया। यही कारण है कि प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच भी उनके व्यवहार में सहजता बनी रहती है।
उनके जन्मदिन के अवसर पर यह कहना उचित होगा कि उन्होंने अपने कर्मों से यह दिखाया है कि राजनीति मूल्य आधारित भी हो सकती है। पद को दायित्व समझना, सुविधाओं को अधिकार नहीं बल्कि जिम्मेदारी मानना, सामाजिक आयोजनों में संयम अपनाना और जनता के बीच सहज रहना,ये सभी गुण लोकतांत्रिक नेतृत्व की पहचान हैं।
आज लोकतंत्र में पद पाने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह प्रेरणा का विषय हो सकता है कि सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और सादगी केवल भाषणों से नहीं आती, उसे आचरण में उतारना पड़ता है। यदि पद को व्यक्ति से ऊपर माना जाए और समाज को केंद्र में रखा जाए, तो शासन व्यवस्था अधिक उत्तरदायी और संवेदनशील बन सकती है।
अंततः वही श्लोक पुनः स्मरण होता है *“कर्मण्येवाधिकारस्ते…”।* कर्म ही अधिकार है, फल की चिंता से परे रहकर कर्तव्य निभाना ही सच्चा नेतृत्व है। डॉ. मोहन यादव का जीवन और उनके निर्णय इस भावना को व्यवहार में उतारते हुए दिखाई देते हैं। उनके जन्मदिन पर यही शुभकामना है कि वे इसी सादगी, संयम और कर्मनिष्ठा के साथ राज्य का नेतृत्व करते रहें और अपने आचरण से समाज को सकारात्मक दिशा देते रहें। यही उनके जीवन की वास्तविक उपलब्धि और लोकतांत्रिक मर्यादा की सच्ची अभिव्यक्ति है।