महासमुंद : 300 साल पुरानी दुर्लभ पांडुलिपियों का होगा डिजिटलीकरण
महासमुंद में 300 वर्ष से अधिक पुरानी दुर्लभ एवं बहुमूल्य पांडुलिपियाँ भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा की ऐतिहासिक धरोहर मानी जाती हैं। इन अमूल्य पांडुलिपियों के संरक्षण और डिजिटलीकरण के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा लॉन्च किए गए “ज्ञान भारतम ऐप” के माध्यम से महत्वपूर्ण कार्य किया जा रहा है।
महासमुंद जिला ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध माना जाता है। जिले में जहाँ हजारों वर्ष पुरानी वैभवशाली सभ्यता के प्रमाण पुरातात्विक स्थल सिरपुर में मिलते हैं, वहीं दुर्लभ पांडुलिपियों के सर्वेक्षण में महासमुंद को छत्तीसगढ़ का सर्वाधिक पांडुलिपियों वाला जिला घोषित किया गया है। जिले में अब तक 2 संस्थाओं एवं 43 परिवारों से कुल 3,286 पांडुलिपियाँ प्राप्त हुई हैं।
वर्तमान में जिले में 300 वर्ष से भी अधिक पुरानी पांडुलिपियों की पहचान की जा चुकी है। विशेष रूप से दूरस्थ वनांचल क्षेत्रों में निवासरत जनजातीय समुदायों के पास दुर्लभ पांडुलिपियाँ सुरक्षित रूप से संरक्षित हैं। इन पांडुलिपियों में अधिकांश ताड़पत्र पर लिखी गई हैं तथा इनमें उड़िया लिपि का प्रयोग किया गया है। सैकड़ों वर्ष पुरानी इन पांडुलिपियों में भागवत पुराण, लक्ष्मी पुराण, दुर्गा ग्रंथ, ज्योतिष ज्ञान, जनजातीय धार्मिक संस्कार पद्धति, जादू-टोना, भूत-प्रेत निवारण, जड़ी-बूटी आधारित औषधि, पशु चिकित्सा, बाण विद्या एवं इतिहास से जुड़े विषय शामिल हैं।
विशेष उल्लेखनीय है कि बागबाहरा ब्लॉक के दूरस्थ और घने जंगलों के बीच बसे गांवों में इन दुर्लभ पांडुलिपियों की खोज हुई है। जनजातीय परिवारों द्वारा सैकड़ों वर्षों से संरक्षित इन पांडुलिपियों का उपयोग आज भी धार्मिक, सामाजिक, चिकित्सा तथा तंत्र-मंत्र संबंधी कार्यों में किया जा रहा है। क्या होती है पांडुलिपि? पांडुलिपि वह हस्तलिखित सामग्री होती है, जो सामान्यतः 75 वर्ष या उससे अधिक पुरानी हो। ये पांडुलिपियाँ ताड़पत्र, भोजपत्र, ताम्रपत्र, चमड़े, कपड़े अथवा अन्य पारंपरिक माध्यमों पर लिखी जाती थीं। इनमें प्राचीन कथाएँ, इतिहास, धार्मिक ग्रंथ, अनुष्ठान विधियाँ, लोकज्ञान एवं औषधीय ज्ञान जैसे महत्वपूर्ण विषय समाहित होते हैं।